मुरिया दरबार का नाम ‘आम दरबार’ करने की कोशिश बस्तर की अस्मिता और संस्कृति पर हमला: विक्रम मंडावी
बीजापुर/जगदलपुर, 19 अक्टूबर (2026): विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के अंतर्गत आयोजित होने वाले ऐतिहासिक और पारंपरिक मुरिया दरबार का नाम बदलने को लेकर बस्तर की सियासत गरमा गई है. बीजापुर से कांग्रेस विधायक विक्रम मंडावी ने इस मामले पर कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए इसे आदिवासियों की पहचान मिटाने की एक सोची-समझी साजिश करार दिया है.
विधायक विक्रम मंडावी ने अपना आधिकारिक बयान जारी कर सरकार और स्थानीय प्रशासन को आड़े हाथों लिया है. उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर की सूची में 'मुरिया दरबार' के स्थान पर 'आम दरबार' लिखा जाना बस्तर के आदिवासियों की आस्था, अस्मिता और उनकी ऐतिहासिक पहचान पर सीधा हमला है.
"यह आदिवासियों और माँ दंतेश्वरी का अपमान है"
विधायक मंडावी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, "बस्तर की 150 साल पुरानी मुरिया दरबार की परंपरा को मिटाने की यह साजिश किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी. नाम बदलना न सिर्फ आदिवासी समाज का अपमान है, बल्कि बस्तर की आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी का भी घोर अपमान है". उन्होंने आरोप लगाया कि जगदलपुर के मशहूर माड़िया चौक का नाम बदलने के बाद अब योजनाबद्ध तरीके से मुरिया दरबार को निशाना बनाया जा रहा है. यह क्षेत्र के जल-जंगल-जमीन और आदिवासी संस्कृति को तोड़-मरोड़ने की एक बड़ी और दुर्भावनापूर्ण सोच का हिस्सा है.
सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि 'आदिम जन संसद' है मुरिया दरबार
मुरिया दरबार के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए विधायक ने कहा कि सिरहासार भवन में लगने वाला यह दरबार महज कोई साधारण सरकारी कार्यक्रम नहीं है. यह बस्तर के पारंपरिक मांझी-चालकी और संपूर्ण आदिवासी समाज की उस जीवंत लोक परंपरा का अनूठा प्रतीक है, जिसमें ग्रामीण अपनी समस्याओं और अधिकारों की बात सीधे प्रशासन के सामने लोकतांत्रिक तरीके से रखते आए हैं. इस ऐतिहासिक 'आदिम जन संसद' के स्वरूप को बदलना बस्तर की लोकतांत्रिक जड़ों को चोट पहुंचाना है.
उग्र आंदोलन की चेतावनी
विधायक विक्रम मंडावी ने प्रदेश के आदिवासी मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से मांग की है कि मुरिया दरबार का नाम बदलने या इसके पारंपरिक स्वरूप से छेड़छाड़ करने के किसी भी प्रयास को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए. उन्होंने साफ तौर पर कहा कि आगामी सभी आधिकारिक दस्तावेजों, आमंत्रण पत्रों और कार्यक्रम सूची में केवल और केवल “मुरिया दरबार” ही लिखा जाना चाहिए. यदि आदिवासी समाज की भावनाओं का सम्मान करते हुए इस नाम को यथावत नहीं रखा गया, तो पूरे बस्तर संभाग में उग्र आंदोलन किया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी.
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